शुक्रवार, जनवरी 12

कदमों में भी राहें हैं



कदमों में भी राहें हैं

अभी जुम्बिश भुजाओं में
कदगों में भी राहें हैं,
अभी है हौसला दिल में
गंतव्य पर निगाहें हैं !

परम  दिन-रात रचता है
जगती नित नूतन सजती,
नींदों में सपन भेजे
जागरण में धुनें बजतीं !

चलें, हम थाम लें दामन
इसी पल को अमर कर लें,
छुपा है गर्भ में जिसके
उसे देखें, नजर भर लें !

अभी झरने दें शब्दों को
प्रस्तर क्यों बनें पथ में,
सृजन का स्रोत है अविचल
बहाने दें सहज जग में !

अभी मुखरित तराने हों
विरह के भी प्रणय के भी,
किसी के अश्रु थम जाएँ
वेदना  से विजय के भी !

नहीं रुकना नहीं थमना
अभी तो दूर जाना है,
जिसे अपना बनाया है
उसे जग में लुटाना है !


मंगलवार, दिसंबर 26

नया वर्ष आने वाला है



नया वर्ष आने वाला है

शब्दों में यदि पंख लगे हों
उड़ कर ये तुम तक जा पहुँचें,
छा जाएँ इक सुख बदली से
भाव अमित जो पल-पल उमगें !

एक विशाल लहर सागर सम
अंतरिक्ष में नाद उमड़ता,
हुआ तरंगित कण-कण भू का
आह्लाद अम्बर तक फैला  !

आगत का स्वागत करने को
 उत्सुक हैं अब दसों दिशाएं,
करें सभी शुभ अभिलाषा जब
कंठ कोटि मंगल ध्वनि गायें !

हर पल मन अभिनव हो झूमे
नित नूतन ज्यों भोर सँवरती,
बाँध सके नहीं कोई ठौर
कहाँ कैद कुसुमों में सुगन्धि !

मंगलवार, दिसंबर 19

जो कहा नहीं पर सुना गया

जो कहा नहीं पर सुना गया


शब्दों में ढाल न पाएँगे
जो जाम पिलाये मस्ती के,
कुदरत बिन बोले भर देती
मृदु मौन झर रहा अम्बर से !

मदमस्त हुआ आलम सारा
कुछ गमक उठी कुछ महक जगी,
तितली भँवरों के झुंड बढ़े
कुसुमों ने पलकें क्या खोलीं !

नयनों से कोई झाँक रहा
जाने किस गहरे अन्तस् से,
कानों में पड़ी पुकार मधुर
इक अनजानी सी मंजिल से !

जो कहा नहीं पर सुना गया
इक गीत गूँजता कण-कण में
जो छिपा नहीं पर प्रकट न हो
बाँधें कोई उस बंधन में !

वह पल होते अनमोल यहाँ
खो जाये मन जब खुद ही में,
मिटकर पा लेता कुछ ऐसा
झलके जीवन की गरिमा में !

शुक्रवार, दिसंबर 15

कितनी धूप छुए बिन गुजरी


कितनी धूप छुए बिन गुजरी


कितना नीर बहा अम्बर से
कितने कुसुम उगे उपवन में,
बिना खिले ही दफन हो गयीं
कितनी मुस्कानें अंतर में !

कितनी धूप छुए बिन गुजरी
कितना गगन न आया हिस्से,
मुंदे नयन रहे कर्ण अनसुने
बुन सकते थे कितने किस्से !

कितने दिवस डाकिया लाया
कहाँ खो गये बिन बाँचे ही,
कितनी रातें सूनी बीतीं
कल के स्वप्न बिना देखे ही !  

नहीं किसी की राह देखता
समय अश्व दौड़े जाता है,
कोई कान धरे न उस पर
सुमधुर गीत रचे जाता है !

बुधवार, नवंबर 15

अभी समय है नजर मिलाएं


 अभी समय है नजर मिलाएं


नया वर्ष आने से पहले
नूतन मन का निर्माण करें,
नया जोश, नव बोध भरे उर
नये युग का आह्वान करें !

अभी समय है नजर मिलाएं
स्वयं, स्वयं को जाँचें परखे,
झाड़ सिलवटों को आंचल से
नयी दृष्टि से जग को निरखे !

रंजिश नहीं हो जिस दृष्टि में
नहीं भेद कुछ भले-बुरे का,
निर्मल आज नजर जो आता
कल तक वह धूमिल हो जाता !

पल-पल बदल रही है जगती
नश्वरता को कभी न भूलें,
मन उपवन हो रिक्त भूत से
भावी हित मन माटी जोतें !

कर डालीं थी कल जो भूलें
उनकी जड़ें मिटा दें उर से,
नव पौध प्रज्ञा की उगायें
नव चिंतन से सिंचन कर के !

बने-बनाये राजपथ छोड़
नूतन राहों का सृजन करे,
नया दौर बस आने को है
मन शुभता का ही वरण करे !

गुरुवार, नवंबर 9

एक निपट आकाश सरीखा



एक निपट आकाश सरीखा



नयन खुले हों या मुँद जाएँ
जीवन अमि अंतर भरता है,
मन सीमा में जिसे बांधता
वह उन्मुक्त सदा बहता है !

चाह उठे उठ कर खो जाये
दर्पण बना अछूता रहता,
एक निपट आकाश सरीखा
टिका स्वयं में कुछ ना कहता !

अकथ कहानी जिसने बाँची
चकित ठगा सा चुप हो जाता,
जाने कितने वेष धरे हैं  
युग युग स्वयं को दोहराता !   

बुधवार, अक्तूबर 25

मौसम

मौसम

मौसम आते हैं जाते हैं
वृक्ष पुनः-पुनः बदला करते हैं रूप
हवा कभी बर्फीली हो चुभती है
कभी तपाती.. आग बरसाती सी..
शुष्क है धरा... फिर
भीग-भीग जाती है  
निरंतर प्रवाह से जल धार के !

मन के भी मौसम होते हैं और तन के भी
बचपन भी एक मौसम है
और एक ऋतु तरुणाई की
जब फूटने लगती हैं कोंपलें मन के आंगन में
और यौवन में झरते हैं हरसिंगार !

फिर मौसम बदलता है
कुम्हला जाता है तन
थिर हो जाता है मन
कैसा पावन हो जाता प्रौढ़ का मन
गंगा के विशाल पाट जैसा चौड़ा
समेट लेता है
छोटी-बड़ी सब नौकाओं को अपने वक्ष पर
सिकुड़ जाता है तन वृद्धावस्था में
पर फ़ैल जाता है मन का कैनवास
सारा जीवन एक क्षण में उतर आता है
मृत्यु के मौसम में.. !

रविवार, अक्तूबर 22

एक दीप बन राह दिखाए

एक दीप बन राह दिखाए


अंतर दीप जलेगा जिस पल
तोड़ तमस की कारा काली,
पर्व ज्योति का सफल तभी है
उर छाए अनन्त उजियाली !

एक दीप बन राह दिखाए
मन जुड़ जाए परम् ज्योति से,
अंधकार की रहे न  रेखा
जगमग पथ पर बढ़े खुशी से !

माटी का तन करे उजाला
आत्मज्योति शक्ति बन चमके,
नयन दीप्त हों स्मित अधरों पर
शब्द-शब्द मोती सा दमके !

जीवन सुधा अखण्ड प्रवाहित
कण भर से ही सृष्टि उमगती,
दामन थाम लिया जिसने भी
बन जाता हर हृदय सुख ज्योति !

शुक्रवार, अक्तूबर 13

जिन्दगी हर पल बुलाती



जिन्दगी हर पल बुलाती

किस कदर भटके हुए से
राह भूले चल रहे हम,
होश खोया बेखुदी में
लुगदियों से गल रहे हम !

रौशनी थी, था उजाला
पर अंधेरों में भटकते,
जिन्दगी हर पल बुलाती
अनसुनी हर बार करते !

चाहतों के जाल में ही
घिरा सा मन बुने सपना,
पा लिये जो पल सुकूं के
नहीं जाना मोल उनका !

दर्द का सामां खरीदा
ख़ुशी की चूनर ओढ़ाई,
विमल सरिता बह रही थी
पोखरी ही उर समाई !

भेद जाने कौन इसका
बात जो पूरी खुली है,  
मन को ही मंजिल समझते
आत्मा सबको मिली है !


बुधवार, अक्तूबर 11

सुख-दुःख


सुख-दुःख 

सुख की तृष्णा एक भ्रम ही तो है
दुःख की पकड़ ही असली चीज
दुःख अपने होने का सबूत देता है
सुख है खुद को मिटाने की तरकीब
सुख बंट रहा है बेमोल पर नहीं कोई उसका खरीदार
दुःख की भारी कीमत चुकानी पड़ती है, पर 
अमीर कहलाने की जैसे सबको है दरकार
सुख मुक्त करता है दुनिया के जंजाल से
कुछ ‘होने’ का भरोसा दिलाता दुःख व्यस्त रखता है हर हाल में
दुःख से छूटना है तो सुख को देनी होगी राह
मित्र उसको बनाने की भरनी होगी भीतर चाह


सोमवार, अक्तूबर 9

लीला एक अनोखी चलती



लीला एक अनोखी चलती 


सारा कच्चा माल पड़ा है वहाँ
अस्तित्त्व के गर्भ में....
जो जैसा चाहे निर्माण करे निज जीवन का !

महाभारत का युद्ध पहले ही लड़ा जा चुका है
अब हमारी बारी है...
वहाँ सब कुछ है !
थमा दिये जाते हैं जैसे खिलाडियों को
उपकरण खेल से पूर्व
अब अच्छा या बुरा खेलना निर्भर है उन पर !

वहाँ शब्द हैं अनंत
जिनसे रची जा सकती हैं कवितायें
या लड़े जा सकते हैं युद्ध,

वहाँ बीज हैं
रुप ले सकते हैं जो मोहक फूलों का
 बदल सकते हैं मीठे फलों में
परिणित किया जा सकता है जिन्हें उपवन में
या यूँ ही छोड़ दिया जा सकता है
सड़ने को !

उस महासागर में मोती पड़े हैं
जिन्हें पिरोया जा सकता है
मुक्त माल में
अनजाने में की गयी हमारी कामनाओं की
पूर्ति भी होती है वहाँ से
हम ही चुन लेते हैं कंटक....
जानता ही नहीं जो, उसे जाना कहाँ है
अस्तित्त्व कैसे ले जायेगा उसे और कहाँ ?
जो जानता ही नहीं खेल के नियम
वह खेल में शामिल नहीं हो पायेगा
लीला चल रही है दिन-रात
उसके और उसके अपनों के मध्य

हमारे तन पहले ही मारे जा चुके हैं
आत्माएं अमर हैं नये-नये कलेवर धर.... 

सोमवार, सितंबर 25

एक पुहुप सा खिला है कौन


एक पुहुप सा खिला है कौन 


एक निहार बूँद सी पल भर
किसने देह धरी,
एक लहर सागर में लेकर
किसका नाम चढ़ी !

बिखरी बूँद लहर डूब गयी 
पल भर दर्श दिखा,  
जैसे घने बादलों में इक
चपला दीप जला !

एक पुहुप सा खिला है कौन 
जो चुपचाप झरे,  
एक कूक कोकिल की गूँजे
इक निश्वास भरे !

एक राज जो खुला न अब तक
कितने वेद पढ़े,  
किसी अनाम की खातिर कौन
पग-पग नमन करे !