शनिवार, मार्च 25

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश (अंतिम भाग )

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश (अंतिम भाग )



गेस्टहाउस के कर्मचारियों ने जो वहाँ पिछले कुछ वर्षों से रह रहे हैं कुछ रोचक बातें बतायीं. मिजोरम में संयुक्त परिवार होते हैं. परिवार के बड़े पुत्र को जायदाद नहीं मिलती, बल्कि सबसे छोटे पुत्र को परिवार का उत्तराधिकारी बनाया जाता है. विवाह और तलाक के मामलों में भी चर्च का कानून ही चलता है. माता-पिता के न रहने पर अथवा असमर्थ होने पर बच्चों की देखभाल का जिम्मा भी चर्च का होता है. क्रिसमस के अलावा मुख्य उत्सव छरपार कुट मनाया जाता है, उत्सव के लिए मिजो शब्द कुट है. यहाँ कोई पिक्चर हॉल नहीं है. हिंदी फ़िल्में यहाँ नहीं दिखाई जातीं. टीवी पर आने वाले धारावाहिक वे मिजो भाषा में डब करके देखते हैं. यहाँ की साक्षरता दर केरल के बाद दूसरे नम्बर पर है. मिजो भाषा की कोई लिपि नहीं है, रोमन भाषा को ही इन्होंने अपनाया है. यहाँ की यात्रा के लिए इनर लाइन परमिट की आवश्यकता होती है. यह छात्रों का एक संगठन मिजो यूथ असोसिअशन बहुत शक्तिशाली है. यह समाज हित के कार्य भी करता है तथा दुर्घटना आदि होने पर आपसी सुलह भी कराता है. यहाँ किसी के घर में प्रवेश करने पर सबसे पहले रसोईघर में प्रवेश होता है, यहीं मेहमानों को बैठाया जाता है. पीने का पानी यहाँ खरीदना पड़ता है. अन्य कामों के लिए ये लोग वर्षा ऋतु में पानी का संग्रह कर लेते हैं, हर घर के नीचे पानी का टैंक होता है. इसी तरह सोलर पावर का भी लगभग सभी लोग इस्तेमाल करते हैं.




सुबह ग्यारह बजे ही हमने वापसी की यात्रा आरम्भ की, एक दिन कोलकाता में रुकना पड़ा क्योंकि डिब्रूगढ़ में अभी तक रात के समय फ्लाईट उतरने की सुविधा नहीं है. अगले दिन सुबह की उड़ान से हम मिजोरम की मधुर स्मृतियों को मन में संजोये हुए वापस घर आ गये. 

शुक्रवार, मार्च 24

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश (तीसरा भाग )

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश (तीसरा भाग )

१७ मार्च २०१७-लुंगलेई
आज भी सुबह मुर्गे की आवाज आने से पहले ही नींद खुल गयी. आज की सुबह भी पहले से बिलकुल अलग थी. कमरे की विशाल खिड़की से जिस पर लगे शीशे से बहर का दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है, पर्दे हटा दिए. अभी बाहर अँधेरा था. आकाश पर तारे नजर आ रहे थे. धीरे-धीरे हल्की लालिमा छाने लगी और गगन का रंग सलेटी होने लगा, फिर नीला और पांच बजे के बाद सूर्योदय होने से पहले आकाश गुलाबी हो गया. साढ़े पांच बजे चर्च की घंटी बजने लगी और लाल गेंद सा सूरज का गोला पर्वतों के पीछे से नजर आने लगा. इसके बाद कुछ दूर कच्चे रास्ते पर नीचे उतर कर हम घाटियों में तिरते बादलों को देखने गये. दूर-दूर तक श्वेत रुई के से बादलों को पर्वतों की चोटियों पर ठहरे हुए देखा. नहाधोकर नाश्ता करके साढ़े सात बजे हमने वापसी की यात्रा आरम्भ की, दोपहर एक बजे वापस आइजोल पहुंच गये. रास्ता सुंदर दृश्यों से भरा था, हरे-भरे जंगल, बेंत के झुरमुट तथा छोटे-छोटे गाँव था कस्बे. मुश्किल से एकाध जगह ही हमें खेत दिखे. इस इलाके में झूम खेती की जाती है. मार्ग में पड़ने वाला वानतांग नामक झरना देखने भी हम गये. काले पत्थरों को काटता हुआ काफी ऊँचाई से बहता हुआ अपनी तरह का एकमात्र जलप्रपात !

मिजोरम में यह हमारी अंतिम रात्रि है. दोपहर का भोजन करके हम शहर के कुछ अन्य दर्शनीय स्थल देखने गये. ताजमहल नामक एक स्मारक जो एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की स्मृति में बनवाया था, जिसमें उसके वस्त्र तथा अन्य सामान भी सहेज कर रखे हैं, अब इस स्मारक में उसके पूरे परिवार को दफनाया गया है. इसके बाद आइजोल की सबसे ऊंची पहाड़ी पर बना थियोलोजिकल कालेज देखने गये. जहाँ से पूरा शहर दिखाई देता है. 

इसके बाद हमारा पड़ाव था निर्माणाधीन सोलोमन टेम्पल, जो पिछले बीस वर्षों से बन रहा है और अभी भी इसके पूरा होने में काफी समय लगेगा. कल दोपहर हमें वापस जाना है.

१८ मार्च २०१७ - आइजोल
कल रात्रि लगभग एक बजे से लगतार समूह गान की आवाजें हमारे कानों में सुनाई दे रही हैं. खिड़की से झांककर देखा तो पिछवाड़े की एक इमारत में लगभग पचास-साथ लोग बेंचों पर बैठे हैं और एक ड्रम की बीट के साथ लय बद्ध गा रहे हैं, लगातार यह गाने का कार्यक्रम चल रहा है. गेस्ट हॉउस के रसोइये ने बताया, कल शाम को ही लाऊडस्पीकर पर एक घोषणा की गयी थी कि कोई व्यक्ति देह त्याग गया है. उसी के शोक में यह गायन चल रहा है. दोपहर बारह बजे के बाद मृतक को ले जायेंगे.

सुबह हम गेस्ट हॉउस के पीछे वाली सड़क पर लगने वाले स्थानीय शनि बाजार को देखने गये, बीसियों दुकानें लगी थीं, ज्यादातर महिलाएं सड़क के दोनों ओर दुकानें लगा रही थीं, दस प्रतिशत ही पुरुष रहे होंगे. कपड़े, बरतन, सजावट की वस्तुएं, खाद्य पदार्थ यानि हर तरह की वस्तुएं वहाँ  बिक रही थीं, उस समय सुबह के साढ़े पांच बजे थे, अर्थात वे लोग अवश्य ही तीन बजे उठ गये होंगे. आज आकाश में बादल हैं, शायद शाम तक वर्षा हो, हवा में एक अजीब तरह की गंध है, यहाँ के अस्सी प्रतिशत लोग खेती से जुड़े कार्यों में रत हैं. साधन न होने के कारण खेती के लिए उपलब्ध जमीन के मात्र छह प्रतिशत पर ही खेती की जा रही है. कल रात को किसी पशु के रोने की आवाज आ रही थी, जिसे सुनकर बचपन में मेहतरों के मोहल्ले से आती करूण पुकार स्मरण हो आयी. काश इन्हें भी शाकाहारी भोजन व्यवस्था के बारे में जानकारी देने वाला कोई संत मिले. चर्च में इनकी आस्था है पर वहाँ न नशे के खिलाफ कुछ कहा जाता है न मांसाहार के ही. डेढ़ वर्ष पहले तक यह शुष्क राज्य था, पर अब सरकारी दुकानें हैं तथा हर व्यक्ति को कार्ड के आधार पर नियत मात्रा में मादक पेय दिया जाता है.
क्रमशः

गुरुवार, मार्च 23

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश ( दूसरा भाग )

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश ( दूसरा भाग )

सुबह पांच बजे से भी पहले मुर्गे की बांग सुनकर हम उठे गये. सूर्योदय होने को था, कुछ तस्वीरें उतारीं. पल-पल आकाश के बदलते हुए रंग यहाँ के हर सूर्योदय को एक आश्चर्यजनक घटना में बदल देते हैं. रंगों की अनोखी छटा दिखाई देती है. गेस्ट हॉउस के रसोइये ने आलू परांठों का स्वादिष्ट नाश्ता परोसा. सवा आठ बजे हम आइजोल से, जो मिजोरम की राजधानी है, लुंगलेई के लिए रवाना हुए. लगभग पांच घंटों तक सुंदर पहाड़ी घुमावदार रास्तों पर चलते हुए दोपहर सवा एक बजे गन्तव्य पर पहुंच गये. सड़क अपेक्षाकृत बहुत अच्छी थी, पता चला यह सड़क विश्व बैंक के सहयोग से बनी है, मार्ग में एक दो स्थानों पर भूमि रिसाव के कारण सड़क खराब हो गयी है, जिसके दूसरी तरफ मीलों गहरी खाई होने के कारण बड़ी सावधानी से चालक वाहन चलाते हैं. मार्ग में एक जगह चाय के लिए विश्राम गृह में रुके, मिजोरम के हर जिले में एक से अधिक सरकारी यात्रा निवास हैं. लुंगलेई का यह टूरिस्ट लॉज भी काफी बड़ा व साफ-सुथरा है. बालकनी से पर्वतों की मनहर मालाएं दिखती हैं. सामने ही मिजोरम के बैप्टिस्ट चर्च की सुंदर भूरे रंग की विशाल इमारत है. बाहर निकलते ही एक बड़ा अहाता है, जिसमें एक वाच टावर बना है. जिसपर चढ़कर हमने सूर्यास्त का दर्शन किया, तथा रंगीन बादलों और आसमान की कुछ अद्भुत तस्वीरें उतारीं. रात्रि में यहाँ का आकाश चमकीले तारों से भर जाता है और धरती भी चमकदार रोशनियों से सज जाती है. हजारों की संख्या में पास-पास घर बने हैं, जो पहाड़ियों को पूरा ढक लेते हैं और शाम होते ही चमकने लगते हैं. यहाँ की हवा में एक ताजगी है.  


मिजोरम के लोगों के रहन-सहन तथा रीतिरिवाजों के बारे में कई रोचक जानकारियां मिली हैं. ये लोग सुबह जल्दी उठते हैं, चार बजे से भी पहले तथा सुबह छह बजे ही दिन का भोजन कर लेते हैं. इसके बाद काम पर निकल जाते हैं तथा दोपहर को भोजन नहीं करते. शाम का भोजन छह बजे ही कर लेते हैं, इसलिए यहाँ बाजार जल्दी बंद हो जाते हैं. कुछ देर पहले हम बाजार गये लेकिन ज्यादातर दुकानें बंद हो चुकी थीं. यहाँ भोजन में ज्यादातर चावल, मांस तथा उबली हुई सब्जियां ही खायी जाती हैं. मसाले भी नहीं के बराबर. यहाँ बहुविवाह प्रथा प्रचलित है तथा स्त्री या पुरुष दोनों को इसका समान अधिकार है. महिलाएं यहाँ सभी प्रकार के काम करती हैं, बचपन से ही उनके साथ कोई भेद भाव नहीं किया जाता. उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का पूरा अवसर मिलता है. तलाक लेना यहाँ बहुत आसान है. किसी भी तरह का विवाद लोग आपसी बातचीत से सुलझा लेते हैं. पुलिस तथा अदालत तक मामला पहुंचने की नौबत नहीं आती. सडकों पर ड्राइवर एक दूसरे को रास्ता देते हैं तथा अपने वाहन को पीछे ले जाने में जरा भी नहीं हिचकते.

१६ मार्च २०१७ लुंगलेई

लुंगलेई में हमारी पहली सुबह है. पंछियों की आवाजों ने हमें जगा दिया, कमरे की खिड़की से परदा हटाया तो सामने पर्वतमालाएं थीं और आकाश पर गुलाबी बादल. जैसे सामने कोई चित्रकार अदृश्य हाथों से अपनी कला का प्रदर्शन कर रहा हो. सामने वाले पहाड़ हरे वृक्षों से लदे थे, उसके पीछे काले पर्वत जिनके वृक्षों की आकृतियाँ खो गयी थीं पर आकार फिर भी नजर आ रहे थे. तीसरी श्रेणी, जहाँ ऊँची-नीची सी वृक्षों की चोटियाँ मात्र दिख रही थीं, और उसके पीछे स्वप्निल से पहाड़ जो धुंध और सलेटी कोहरे में लिपटे थे. एक के पीछे एक तीन-चार पर्वत श्रेणियां और ऊपर गहरा नीला आकाश और उस पर सुनहरे चमकते बादल, जो गगन के राजा के आने का संदेश दे रहे थे. तभी चर्च से घंटियों का स्वर आने लगा और पूरा वातावरण एक आध्यात्मिक रंग में सराबोर कर गया. कुछ देर बाद हम प्रातः भ्रमण के लिए निकले, हवा ठंडी थी, बाहर का तापमान आठ डिग्री था. निकट ही बादलों को पर्वतों की श्रंखलाओं पर सिमटते हुए देखा, एक अद्भुत दृश्य था.  


अब शाम के पांच बजे हैं. हम आज जल्दी जाकर बाजार से लौट आये हैं. सुबह पतिदेव जब अपने काम के सिलसिले में चले गये तो मैंने कुछ देर कमरे में रखी बाइबिल पढ़ी, नया नियम नाम से छोटी सी हिंदी में लिखी पुस्तक, जो कई स्थलों पर बहुत रोचक और उत्साहवर्धक लगी, परमात्मा का राज्य हमारे भीतर है, हम इस बात को भुला देते हैं और व्यर्थ ही परेशान होते हैं. कल हमें वापस आइजोल जाना है और परसों कोलकाता, तथा उसके अगले दिन असम. 
क्रमशः

बुधवार, मार्च 22

ओ रे मन !


ओ रे मन !

किस उलझन में खोये रहते 
किस पीड़ा को पल-पल सहते,
सुनो गीत जो नभचर  गाते
निशदिन  मधुर राग बहता है !

किस शून्य को भरे हो भीतर 
कण-कण में अमृत बसता है,
सपनों ने दिन-रात जलाया 
खुली आंख ही वह मिलता है !

एक विशाल वितान सजाया  
रंगमंच पर नट अनेक हैं,
सुख-दुःख के झीने पर्दे में 
सदा एकरस कुछ रिसता  है !

पाँव रुके उर की जड़ता से 
चाह अधीर करे धड़कन को,
दोनों ही के पार गया जो 
हरसिंगार चुना करता है !


मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश


मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश
१४ मार्च २०१७-आइजोल 

सुबह पौने छह बजे हम दुलियाजान-असम से रवाना हुए थे. सवा आठ बजे फ्लाईट डिब्रूगढ़ के मोहनबारी हवाईअड्डे से चली और पौने दस बजे कोलकाता पहुंची. जहाँ तीन घंटे प्रतीक्षा करने के बाद दोपहर एक बजे स्टारलाइंस-एयर इंडिया के विमान ने आइजोल के लिए उड़ान भरी. हवाईअड्डे पर कई मीजो लड़के-लडकियाँ थे, सभी काफी प्रसन्न, जरा उनसे नजरें मिलाओ तो मुस्कुराने को तैयार ! छोटी सी फ्लाईट थी लगभग पचास मिनट की, ऊपर से सैकड़ों मीलों तक फैली हरियाली से ढकी पर्वतों की श्रृंखलायें दिख रही थीं, एक के बाद एक पहाड़ों की चोटियाँ, घाटियाँ नहीं के बराबर. दोपहर दो बजे हम मिजोरम के लुंगपेई हवाईअड्डे पर पहुंचे, जहाँ कई सुंदर छोटे-छोटे बगीचे फूलों से भरे थे. 

बाहर निकले तो हर तरफ वृक्षों की कतारें. शहर से काफी दूर है हवाईअड्डा, लगभग सवा घंटा पहाड़ों के सान्निध्य में छोटी सी पतली सड़क पर यात्रा करने के बाद हम कम्पनी के गेस्ट हॉउस पहुंचे. रास्ते में बांसों के झुरमुट और फूल झाड़ू के पेड़ बहुतायत में दिखे. दो तीन जगह पिकनिक स्पॉट जाने के मार्ग बताते बोर्ड दिखे. यह हल्के हरे रंग से रंगी चार मंजिला इमारत है. स्वादिष्ट नाश्ता करके हम शहर घूमने निकले. पूरा शहर या कहें पूरा प्रदेश ही पहाड़ियों पर बसा है, सडकें ऊंची-नीची हैं, कहीं-कहीं तो खड़ी चढ़ाई है, लेकिन यहाँ के ड्राइवर इतने अभ्यस्त हैं कि ऐसी सडकों पर आराम से वाहन चला लेते हैं. हमने एक पारंपरिक मिजो ड्रेस खरीदी. यहाँ के लोग कुत्तों से बहुत प्रेम करते है. एक महिला को देखा स्कूटर पर एक कुत्ते को शाल में लपेटे ले जा रही थी, जैसे कोई अपने बच्चे को ले जाता है. याद आया, एक मिजो लडकी यात्रा में हमारे निकट बैठी थी, जो हैदराबाद में ब्यूटी पार्लर में काम करती है, अब छुट्टियों में घर जा रही थी. उसने बताया था, मिजोरम में कोई स्ट्रीट डॉग नहीं होता. सडकों पर महिलाएं और बच्चे ज्यादा नजर आ रहे थे, सभी प्रसन्न मुद्रा में.

१५ मार्च २०१७ – आइजोल

मिजोरम की हमारी यह पहली यात्रा है. इस प्रदेश के बारे में हम कितना कम जानते हैं, १९७२ में केंद्र शासित प्रदेश बनने से पूर्व यह असम का एक जिला था, फरवरी १९८७ में लंबे हिंसक संघर्ष के बाद भारत सरकार व मिज़ो नेशनल फ्रंट के मध्य समझौता होने पर यह भारत का तेइसवां राज्य घोषित किया गया. इसके पूर्व और दक्षिण में म्यांमार है तथा पश्चिम में बांग्लादेश. मिजोरम से उत्तर-पूर्व भारत के तीन राज्यों असम, मणिपुर तथा त्रिपुरा की सीमाएं भी मिलती हैं. प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर यह प्रदेश विभिन्न प्रजातियों के प्राणियों तथा वनस्पतियों से सम्पन्न हैं. इसी अनजाने प्रदेश के आठ जिलों में से एक लुंगलेई जिले में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता का सर्वे करने के लिए भारत सरकार की और से विभिन्न सरकारी तेल कम्पनियों के अधिकारियों को नियुक्त किया गया है. इसी कारण मुझे भी पतिदेव के साथ यहाँ आने का अवसर मिल गया है. मिजोरम का अर्थ है पहाड़ी प्रदेश के लोगों की भूमि ! यह प्रदेश जैसे भारत की मुख्य भूमि से बिलकुल अलग-थलग है. माना जाता है कि यहाँ के निवासी दक्षिण-पूर्व एशिया से सोलहवीं और अठाहरवीं शताब्दी में आये थे, बर्मा की संस्कृति का इन पर काफी प्रभाव है, देखने में भी यह उन जैसे लगते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी में यहाँ ब्रिटिश मिशनरियों का प्रभाव फ़ैल गया. लगभग पचासी प्रतिशत लोग ईसाई धर्म के अनुयायी हैं भारतीय संसद में प्रतिनिधित्व के लिए लोकसभा में यहाँ से केवल एक सीट है. विधान सभा में चालीस सदस्य हैं. 
क्रमशः

रविवार, मार्च 12

होली है !


होली है !

होली जगाती है 
तमस की नींद से 
जड़ता की कैद से 

होली जलाती है 
आपस के वैर को
द्वेष के जहर को 

होली बताती है 
प्रीत की रीत को 
सत्य की जीत को

होली सिखाती है 
रंगों की भाषा से  
जीवन की आशा से 

होली पढ़ाती है 
कथा प्रहलाद की 
राधा व श्याम की 

होली भर जाती  है 
राग और रंग से 
दिल की उमंग से   


शनिवार, मार्च 11

जीवन स्वप्नों सा बहता है



जीवन स्वप्नों सा बहता है 


आज नया  दिन 
अग्नि समेटे निज दामन में 
उगा गगन में अरुणिम सूरज 
भर उर में सुर की कोमलता 
नये राग छेड़े कोकिल ने 
भीगी सी कुछ शीतलता भर 
नई सुवास हवा ले आयी
मंद स्वरों में गाती वसुधा 
 पल भर में हर दिशा गुंजाई 
उड़ी अनिल संग शुष्क पत्तियां 
कहीं झरे पुहुपों के दल भी 
तिरा गगन में राजहंस इक 
बगुलों से बादल के झुरमुट 
नीला आसमान सब तकता 
माँ जैसे निज संतानों को 
जीवन स्वप्नों सा बहता है 
भरे सुकोमल अरमानों को...

शुक्रवार, मार्च 10

दिल का द्वार रहे उढ़काए


दिल का द्वार रहे उढ़काए 


नजर चुरायी जिस क्षण तुझसे 
खुद से ही हम  दूर हो गये, 
तेरे दर पर झुके नहीं जो 
 दिल खुद से मजबूर हो गये  !

स्वप्निल नैना बोझिल सांसें  
दूर खड़ी ललचाती मंजिल,
कितने दांवपेंच खेले पर 
सभी इरादे  चूर हो गये !

राग जगाता जग भरमाता 
हर सुकून ख्वाब बन टूटा, 
मनहर खेल रचाए जितने  
आखिर सभी  कुसूर हो गये !

हर उस क्षण तू वहीं रुका था 
हाथ बढ़ाने से मिल सकता,
कैसी मदहोशी छायी थी 
भूले से मगरूर हो गये !

सुने थे तेरे कई फसाने 
है अनंत प्रेम का सागर,
दिल का द्वार रहे उढ़काए 
इसमें ही मशहूर हो गये !




गुरुवार, मार्च 9

एक दिन



एक दिन


एक दिन आएगा  
जब सही अर्थों में समान होंगे हम 
परमात्मा की ज्योति से दीप्त 
मनु और शतरूपा की भांति 
एक समान आवश्यक 
उसे जन्माने में 
पंछी के दो परों की भांति 
जीवन के हर द्वंद्व की भांति 
अपरिहार्य एक से 
नहीं होगी कोई प्रतिद्वंद्वता 
न कोई स्पर्धा 
न कोई छोटा और बड़ा 
जीवन के पथ पर संग-संग कदम बढ़ाते 
दो मित्रों की भांति हम लिखेंगे 
भविष्य की नई पीढ़ियों का भाग्य 
निज संस्कारों से पोषित करेंगे 
उनकी अछूती कोमल निष्पाप आत्माएं 
एक दिन आयेगा 
जब हम पुनः मिलेंगे 
समान स्तर पर 
न कोई अनुगामी होगा 
न पीछे चलेगा छाया बनकर 
साथ-साथ होकर भी हम 
नहीं खोएंगे अपनी अस्मिताएं 
सृजन करेंगे मूल्यों और दीर्घकालिक परंपराओं का  
जो कभी गीत और कभी नृत्य बनकर 
जीवित रखेंगी हमारी स्मृतियों को ! 

मंगलवार, मार्च 7

रंग चुरा के कुछ टेसू के




 रंग चुरा के कुछ टेसू के

सुरभि भरे निज आंचल में फिर 
गीत गा रही  पवन बसंती,
नासापुट की खत्म प्रतीक्षा 
भीगा उर फागुन  की मस्ती !

कंचन झूमा, खिला पलाश 
बौराया आम्रवन सारा,
आड़ू, नींबू सभी महकते 
कामदेव ने किया इशारा ! 

एक तरफ झरते हैं पत्ते 
नव कोमल पल्लव उग आते,
जीवन-मृत्यु संग घट रहे 
महुआ चूता भंवरे गाते !

कुसुमित प्रमुदित खिली वाटिका
ऋतुराज रचता रंगोली,
  रंग चुरा के कुछ टेसू के 
क्यों न खेलें पावन होली !



सोमवार, मार्च 6

एक बीज बोया अंतर में


एक बीज बोया अंतर में


 ऊपर कितना ही साधा हो 
एक खोज भीतर चलती है, 
नहीं यहाँ विश्राम किसी को 
सदा वही पथ पर रखती है !

किन्तु अनोखे राहीगर हम 
हर पड़ाव पर खेमे गाड़े,
जैसे मिल ही गयी हो मंजिल
हुए बेखबर खुद से हारे !

जाग रहा है भीतर कोई 
रहे ताकता पल-पल जैसे,
बाहर ही बाहर हम तकते 
मिलन घटे फिर उससे कैसे !

है अनंत धैर्यशाली वह 
किन्तु डसे अधीरता मन को,
प्रीत पगा वह सहज डोलता 
मुरझाया उर तपन सहे जो !

श्वासों की अलख डोरी सा 
मिल सकता पर नहीं मिला है 
एक बीज बोया अंतर में 
खिल सकता पर नहीं खिला है !



शुक्रवार, मार्च 3

हर भारतवासी देश भक्त है


हर भारतवासी देश भक्त है 

हर फूल अनोखा है बगिया में 
 निज रंग और गंध लुटाता हुआ अपने तरीके से 
हर पंछी गाता है अपनी ही धुन में  

 प्यार का इजहार भी करता है 
तो हर कोईअपनी तरह से 
अपनी माँ को पुकारने का हर बच्चे का 
निजी तरीका है 
कोई नहीं कह सकता 
यही एक मात्र सलीका है 

विभिन्नता में एकता देख लेते हैं हम 
अद्वैत की हवा में जीते आये हैं हम 
उस भारत में क्यों आज दिल तंग हुए 
बेवजह ही अपनों से हम रंज हुए 
निज मत रखने का है हर किसी को अधिकार 
मेल-मोहब्बत ही है भारत के भारत होने का आधार !

गुरुवार, मार्च 2

शब्द और अर्थ



शब्द और अर्थ



कहते-सुनते, लिखते-पढ़ते
बीत गये युग-युग, फिर भी
नये-नये ही अर्थ दे रहे
शब्द रहे नित नूतन ही !

प्रेम जिसे कहते थे पहले
माने उसके बदल गये अब,
भक्ति नहीं अब मने मनौती
मंदिर में व्यापार चले जब !

कुनबा कहते ही आँखों में
दादी, नानी  लगें झलकने,
किस नाम से इसे पुकारें
दो जन रहते दो कमरों में !








सोमवार, फ़रवरी 27

बंटना ही जीवन है



 बंटना ही जीवन है 

सूर्य बांटता है अपनी ऊर्जा
सृष्टि के हर कण से
पुहुप  सांझा करता है
 मधु और गंध
हवा प्रवेश करती आयी है अनंत नासापुटों में
अनंत काल से !

अस्तित्त्व लुटा रहा है बेशर्त पल-पल
जितना देता है वह
 उतना ही भरता जाता है
न जाने  किस अदृश्य कोष से !

लुटाती है माँ अपने अंतर का प्रेम
पोषित होगी शिशु की आत्मा
देह भी उष्ण है मन की ऊष्मा से !

शुचिता है वहाँ जहाँ बहाव है
अटका हुआ मन ही उलझाव है
रोक ली गयी ऊर्जा ही
मन का भटकाव है
अनवरत झरती ऊर्जा ही
भक्ति का भाव है !



शनिवार, फ़रवरी 25

चार कदम पर ही है होली


चार कदम पर ही है होली

मधु टपके बौराया उपवन
जाने कहाँ से रस  भरता है,
गदरायीं मंजरियाँ महकें 
संग समीरण के बहता है !

हुई नशीली फिजां चहकती 
फगुनाई सिर चढ़ कर बोली,
रंग-बिरंगी बगिया पुलके 
चार कदम पर ही है होली !

नन्ही चिड़िया हरी दूब पर 
नई फुनगियाँ  हर डाली पर,
कोई भेज रहा  है शायद
 पाती  गाता  पंछी सुस्वर !

हर पल जीवन उमग रहा है 
कभी धरा से कभी गगन से,
अंतर में यूँ भाव उमड़ते 
धुंधलाया हर दृश्य नयन से !

धूप और छाँव हर पल हैं 
दिवस-रात्रि, सुख-दुःख का मेला,
हास्य-रुदन दोनों घटते हैं
प्रीत बहाए दुई का रेला !

एक से ही उपजे हैं दोनों 
पतझड़ और बसंत अनूठे,
विस्मय से भर जाता अंतर 
दोनों के ही ढंग अनोखे !