बुधवार, जून 28

हाथ थाम भी ले जाता है


हाथ थाम भी ले जाता है


जागें हम, कोई यह चाहे
भांति-भांति के करे उपचार,
कभी पिलाये दुःख का काढ़ा
सुख झूला दे कभी पुचकार !

राहें यदि दुर्गम लगती हों
हाथ थाम भी ले जाता है,
किंतु यदि न सजग रहा कोई
पथ का पत्थर बन जाता है !

ठोकर खाकर भी हम जागें
आखिर कब तक यूँ भटकेंगे,
चार दिनों का रौनक मेला
जरा मिलेगी, नयन मुदेंगे !

जाने कितने भय भीतर हैं
जड़ें काटना वह सिखलाये,
यदि न जागरण अविचलित रखा

झट आईना वह दिखलाये !

शुक्रवार, जून 23

अंतर इक दिन बने प्रार्थना


अंतर इक दिन बने प्रार्थना


उसके सिवा न कोई जग में
उसकी ही ख़ुशबू कण-कण में,
उससे ही प्रकटी हर शै है
उसकी ही प्रतिमा हर मन में !

ऐसा है वह, वैसा है वह
जाने कितने रूप बनाये,
दूर खुदा से अब भी उतना
मंदिर-मस्जिद रोज बनाये !

छिपी प्रीत है भीतर गहरे
अंतर है सूना का सूना,
अनजाना ही जग रह जाये
हर सूं फैला जलवा उस का !

पहली पुलक प्रेम है उसका
प्रेम ही पूजा, आराधना,
धीरे-धीरे लगे महकने
उर एक दिन बने प्रार्थना !

द्वार दिलों के रहें न उढ़के,
 प्रेम छलकता आता पल में,
कोमल सा अहसास खुदा है
जाना जाता सदा प्रेम में !

रतन अमोल छिपा तकता है
ढूँढ ले कोई खोया प्यार !
शब्द बड़े छोटे पड़ जाते,
मौन में बहती मदिर बयार !






बुधवार, जून 21

दोराहे हर मोड़ खड़े हैं




दोराहे हर मोड़ खड़े हैं



कहीं प्रज्ज्वलित अग्नि शिखा सी
कहीं धुँए से ढकी सुलगती,
कहीं सुगंधित अनिल बह रही
कहीं घुटन से फिजां रुँधी सी !

जीवन मिले बिछाय बिसातें 
चाहे जिस पाले में जाएँ,
पल-पल चुनना स्वयं को यहाँ
किसे सहेजें किसे लुटाएं !

दोराहे हर मोड़ खड़े हैं
निज हाथों में ही गेंद सदा,
हों स्वतंत्र हर दांवपेंच में
काटेंगे खुद का ही बोया !

एक ही नियम एक सदुपाय
जागे-जागे कदम बढ़े हर,
सूत्र यही इस खेल का सहज
यही बहे बन विजय का सुस्वर !

सोमवार, जून 19

तृषित उर की मालती है


तृषित उर की मालती है

खिल न पाया कमल दिल का
यही पीड़ा सालती है,
इक तंद्रालस ने घेरा
बात कल पर टालती है !

जगत केवल इक बहाना
एक अवसर, रास्ता इक,
खोज खुद की चल रही है
तृषित उर की मालती है !

साज भी है उँगलियाँ भी
मृदु रागिनी भी बज रही,
श्रवण लेकिन सुन न पाते
 चेतना धुन पालती है !

नीलवर्णी शुभ्र नभ पर
डोलते हैं मेघ सुंदर,
इस व्यूह में खो गया मन
पाश माया डालती है !

चले मीलों दूर फिर भी
मंजिलों से रहते सदा,
नींद लोरी दे सुलाए
सोमरस जो ढालती है !

रविवार, जून 18

बूँद यहाँ हर नयना ढलकी


बूँद यहाँ हर नयना ढलकी


जाने क्या पाने की धुन है
हर दिल में बजती रुनझुन है,
किस आशा में दौड़ लगाते
क्षण भर की ही यह गुनगुन है !

दिवस-रात हम स्वप्न देखते
इक उधेड़बुन जगते-सोते,
चैन के दो पल भी न ढूँढे
जीवन बीता हँसते-रोते !

जाने कितनी बार मिला है
फूल यही हर बार खिला है,
स्रोत खोज लें इस सौरभ का
क्यों आखिर मन करे गिला है !

करुणा भरी कहानी सबकी
एक वेदना ही ज्यों छलकी,
सुख भी मिलता साथ दुखों के
बूँद यहाँ हर नयना ढलकी !  

खुला रहस्य, राज इक गहरा
रब पर लगा न कोई पहरा,
खुली आँख भी वह दिखता है
मिलने उससे जो भी ठहरा !

शुक्रवार, जून 16

ओ मेरे मन !

ओ मेरे मन !


ओ मेरे मन !
जरा थम तो सही
कर पहचान खुद से
हजार छिद्रों वाला तू
पूर्ण क्योंकर हो सकेगा
अभाव यह तेरा कभी न भरेगा
तू मान ही ले
यह सच्चाई आज जान ही ले

तुझे ऐसा ही बनाया है
ऊपरवाले ने ही खेल रचाया है
तू कभी गाता कभी रोता है
दोनों बार ही नयन भिगोता है
दो कलों के मध्य डोलता रहता
कभी न खुद के करीब होता है

ओ मेरे मन !
थम जायेगा तू जिस पल
रुक जाएगी तेरी हलचल
जानेगा अपने कूल को
प्रकाश के उस मूल को


गुरुवार, जून 15

सरस बना पल-पल आ डोले

सरस बना पल-पल आ डोले


सुख आशा में जाने कितने
दुःख के बीज गिराए पथ में,
जिन्हें खोलने के गुर सीखें
बाँधे बंधन निज हाथों से !

एक बूंद भी विष की जग में
जीवन हर लेने में सक्षम,
धूमिल सी भी कोइ कामना
ढक देती अंतर का दर्पण !

यहाँ लगा बाजार चाह का
होश कहाँ से जगे हृदय में,
फूलों से जो सज सकता था
कंटक उगते मार्ग प्रणय में !

प्रथम कदम को दिशा मिले गर
खुदबखुद राहें खुलीं, गातीं,
सरस बना पल-पल आ डोले
जन्मों की अकुलाहट जाती !


सोमवार, जून 12

लौट चलें क्यों ना अपने घर


लौट चलें क्यों ना अपने घर


गर तलाश सुकून की दिल में
भटक-भटक यदि ऊब गया उर,
राह तके कोई बैठा है
लौट चलें क्यों ना अपने घर !

ठोकर ही खायी हो जिसने
पलकों पर यह उसे बिठाये,
सदा मुखौटा ही ओढ़ा हो
सहज सादगी से देगा भर !

स्वर्ग-नर्क, सुख-दुःख के सपने
नहीं दिखाता कभी किसी को,
सौगातें अनमोल लिए यह
सहज लुटाता जीवन  के स्वर !

नहीं माँगता कीमत कोई
मोल बिना बिकने को आकुल
धूल छान ली हो जग की तो
झुका दें निज द्वार यह अंतर !




शनिवार, जून 10

समर्पण


समर्पण 

झुका चरणों में जब-जब कोई माथ
पाया सर पर सदा कोई अदृश्य हाथ
नयनों से झरते जिस पल अश्रु कृतज्ञता के
हरे हैं भाव सारे उसने अज्ञता के
पाया कुछ अनमोल.. क्या है.. कहा नहीं जाता
ऐसा कोई गीत है जो शब्दों में नहीं समाता
सारा अस्तित्त्व जैसे समा गया हो भीतर
या खो गया मन भी उस महान के अंदर
रहा कौन शेष , लुप्त हुआ कौन.. यह भी रहता अस्पष्ट है
बस भीतर पुलक नहीं कोई कष्ट है
धरा बन जाती अनोखा रंगमंच
खो जाता पल भर को जैसे हर प्रपंच
वृक्ष देते ताल उस नृत्य के साथ
जो भीतर घटता
बदल जाता सब कुछ देखते-देखते
पर कोई नजर ना आता
कैसा अनोखा वह सुमिलन का क्षण
सज उठता अस्तित्त्व का कण-कण
भीतर-बाहर का रहता भेद नहीं कोई
एक अनंत की खुशबू रग-रग में समोई
शमा जली है जब जान जाता कोई यह
बन परवाना जल कर भी बचा ही रहता वह
थोथा उड़ गया तब सार ही शेष
हर श्वास हर क्षण लगता विशेष !

सोमवार, जून 5

राग मधुर भीतर जो बहता


राग मधुर भीतर जो बहता

क्या कहना अब क्या सुनना है
मौन हुए उसको गुनना है,
होकर भी जो नहीं हो रहा
उस हित भाव पुष्प चुनना है !

क्या चाहें किसको खोजें अब
अंतहीन तलाश हर निकली,
मिलकर भी जो नहीं मिला है
कदमों पर उसके झुकना है !

क्या पाना अब किसे सहेजें
किसका लोभ ? लाभ अब चाहें,
छूट रहा पल-पल यह जीवन
श्वासों का अंबर बुनना है !

राग मधुर भीतर जो बहता
जर्रा जर्रा जिसे समेटे,
हट जाना राहों से उसकी
अनायास उसको बहना है !

अंतर में जो दीप जल रहा
राह दिखाता वही अंत में,
रोशन कर दे कंटक सारे
एक-एक कर सब चुनना है !