गुरुवार, जुलाई 19

बस चंद पल और यहाँ


बस चंद पल और यहाँ


बस चंद पल और यहाँ
फिर डेरा डंडा
समेटना होगा
फूल जो उगा है मस्ती में
शाम होते ही उसे
झर जाना होगा
कीमती हैं ये चंद पल
भीतर जो भी
लुटाएं जी भर
सुमन बिखेर देता
 सुरभि ज्यों
दिलों में बस जाएँ जाकर..
न जाने किस देश में
फिर जाना होगा
लोग बेगाने
रास्ता अनजाना होगा
जब तक तेल दीपक में है
रौशनी लुटानी है
जब वक्त आयेगा चुपचाप
बत्ती बढ़ानी है
बन पड़े जितना
चेहरा इस जग एक और  
साफ हो जाये
एक एक बीज से ही
नया उपवन खिल जाये.. 

13 टिप्‍पणियां:

  1. एक एक बीज से ही
    नया उपवन खिल जाये.. वाह: बहुत ही भावमयी रचना..

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  2. न जाने किस देश में
    फिर जाना होगा
    लोग बेगाने
    रास्ता अनजाना होगा
    जब तक तेल दीपक में है
    रौशनी लुटानी है

    बहुत ही सुन्दर लगी ये कविता।

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  3. कब जाने दुनियां ममता को ?
    पहचाने दिल की क्षमता को
    हम दिल को कहाँ लगा बैठे ?
    कब रोये,निज अक्षमता पर ?
    तुम मेरी कमजोरी का भी, जो चाहे अर्थ लगा लेना !
    हम जल्द यहाँ से जायेंगे,बस यही कहानी जीवन की !

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    1. वाह ! कितनी सुंदर पंक्तियां हैं आपकी...आभार !

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  4. माहेश्वरी जी व शालिनी जी आप दोनों का स्वागत व आभार !

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (21-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  6. बहुत सुंदर रचना :
    बायोटेक्नोलोजी वालों को समझाना होगा
    एक बीज ऎसा ही बनवाना होगा

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  7. न जाने किस देश में
    फिर जाना होगा
    लोग बेगाने
    रास्ता अनजाना होगा
    जब तक तेल दीपक में है
    रौशनी लुटानी है

    वाह बहुत खूब .....
    सुंदर पंक्तियाँ !!
    बस कोशिश रहनी चाहिए सदा रौशनी बिखेरने की, कही भी रहें ...
    सादर !!

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  8. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना बहुत बहुत बधाई

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  9. चेहरा इस जग एक और
    साफ हो जाये
    एक एक बीज से ही
    नया उपवन खिल जाये..

    सब समझ जाएं तो क्‍या बात है !!

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