गुरुवार, अगस्त 30

चंदा ज्यों गागर से ढलका



चंदा ज्यों गागर से ढलका

खाली है मन बिल्कुल खाली
एक हाथ से बजती ताली,
चेहरा जन्म पूर्व का जैसे
झलक मृत्यु बाद की जैसे !

ठहरा है मन बिल्कुल ठहरा
मीलों तक ज्यों फैला सेहरा,
हवा भी डरती हो बहने से
श्वासों पर लगा है पहरा !

हल्का है मन बिल्कुल हल्का
नीलगगन ज्यों उसमें झलका,
जो दिखता है किन्तु नहीं है
चंदा ज्यों गागर से ढलका !

है अबूझ सब जान रहा है
कहना मुश्किल, मान रहा है,
पार हुआ जो जिजीविषा से
खेल मृत्यु से ठान रहा है !



11 टिप्‍पणियां:

  1. है अबूझ सब जान रहा है
    कहना मुश्किल, मान रहा है,
    पार हुआ जो जिजीविषा से
    खेल मृत्यु से ठान रहा है !
    sahi likha hai ....

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  2. बहुत ही सुन्दर और मोहक.....खाली है मन बिलकुल खाली

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  3. है अबूझ सब जान रहा है
    कहना मुश्किल, मान रहा है,
    पार हुआ जो जिजीविषा से
    खेल मृत्यु से ठान रहा है !
    सुन्दर... गहन अभिव्यक्ति के लिए आभार

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  4. है अबूझ सब जान रहा है
    कहना मुश्किल, मान रहा है,
    पार हुआ जो जिजीविषा से
    खेल मृत्यु से ठान रहा है !

    ....बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  5. aaj apki rachna mi itni kashmokash, itni nirasha si kyu...jo sada doosro ko marg dikhati hai ?

    sunder prastuti.

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    1. अनामिका जी,आप सही कहती हैं.. मन को जहाँ विश्राम मिला हो, हल्का हो गया हो, वहाँ निराशा नहीं हो सकती.

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  6. वाह! बहुत खूब.
    अनुपम प्रस्तुति.

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  7. मन के अनेक रूप सामने ला दिये आपने तो !

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  8. अनुपमा जी, माहेश्वरी जी, प्रतिभा जी, राकेश जी, अनामिका जी, कैलाश जी, संध्या जी, इमरान आप सभी का स्वागत व आभार !

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  9. मधुर सी कविता ..शाश्वत भाव..

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