सोमवार, अक्तूबर 29

मन की नदी



मन की नदी

श्वास और मौन के दो तटों के मध्य
बहती है मन की नदी...
जिसे लील जाता है कभी अगाध मरुथल
निगल जाता है कभी आसमान
जाने कितनी नदियाँ गुम हो गयीं
कुछ पल हँस कर फिर चुप हो गयीं
सुना है इस तट पर या उस तट पर
उतर जाता है कभी कोई राही
तो हजार राहें बिछ जाती हैं
उसके लिए फूलों भरी
कतारें लग जाती हैं.... रोशनियों की
झालरें झूमती हैं...
पर यह होता है कभी..कभी...

21 टिप्‍पणियां:

  1. मन की गंगा को मिले, मंजिल कभी कभार ।

    जटाजूट में भटकती, हो मुश्किल से पार ।

    हो मुश्किल से पार, करे कोशिशें भगीरथ ।

    परोपकार सद्कर्म, जिन्दगी रविकर स्वारथ ।

    स्वांस मौन के बीच, मचाये किस्मत दंगा ।

    इसीलिए खो जाय, अधिकतर मन की गंगा ।।

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    1. अति सुंदर काव्यात्मक टिप्पणी...आभार रविकर जी !

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  2. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  3. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 31/10/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  4. काश! ये जो कभी-कभी है न हर पल का हो जाता ..

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    1. सही है अमृता जी, पर तब उसका इतना महत्व भी नहीं रहता शायद...

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  5. श्वास और मौन के दो तटों के मध्य
    बहती है मन की नदी...

    बहुत सुंदर बिम्ब ले कर काही है बात .... सुंदर प्रस्तुति

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  6. आपकी उम्दा पोस्ट बुधवार (31-10-12) को चर्चा मंच पर | जरूर पधारें | सूचनार्थ |

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  7. तो हजार राहें बिछ जाती हैं
    उसके लिए फूलों भरी
    कतारें लग जाती हैं.... रोशनियों की
    झालरें झूमती हैं...
    पर यह होता है कभी..कभी...
    -- कभी कभी - कैसा विरल संयोग !

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    1. वाकई प्रतिभा जी यह अति विरल संयोग है..

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  8. कितना सुन्दर लिखा है तो तटों के बिच मन....वाह अनीता जी।

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुतिकरण

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  10. मन की नदिया बड़ी सुहानी
    श्वाँस सेतु पर आनी जानी
    मौन नाव ,पतवार पुरानी
    तट पहुँचे तो, बड़ी रवानी
    मन की नदिया बड़ी सुहानी ||

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    1. अरुण जी, आपकी रसमयी टिप्पणी आनन्दित कर गयी..आभार!

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  11. यशवंत जी, अनामिका जी, संगीता जी, संगीता पुरी जी, इमरान आप सभी का स्वागत व आभार !

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