रविवार, जुलाई 9

गुरू पूर्णिमा के अवसर पर


गुरू पूर्णिमा के अवसर पर


युगों-युगों से राह दिखाते
उर-अंतर का तमस मिटाते,
ज्योति शिखा सम सदा प्रज्ज्वलित
सीमाओं में नहीं समाते !

प्रेम, ज्ञान, सुख पुंज शांति के
सुमन खिलाते परा भक्ति के
बिना भेद दिल से अपनाया
बंधन तोड़कर आसक्ति के !

विश्व बना परिवार तुम्हारा
सदा साथ रह बने सहारा
हो अनंत अनंत से मिलकर
सागर भी तुम तुम्हीं किनारा !

अपना जान तुम्हें जो भजता
शांति, ज्ञान से दामन भरता,
बाहर जो सुख ढूँढ़ रहा था
खुद के भीतर ही पा जाता !

जीवन मर्म, भेद समझाया
तुमने अपना आप दिखाया,
दुःख, पीड़ा आते-जाते हैं
सत्य शाश्वत ज्ञान बरसाया !

तुम क्या हो बस तुम्हीं जानते
निरख अदा हम वारी जाते,
जो आत्म निर्दोष है भीतर
उसकी आहट पा खिल जाते !

गुरू पूर्णिमा साँझ दिव्य है
महिमा गुरू की नित भव्य है,
नतमस्तक हो नमन करें हम
चरण धूलि गुरू की सेव्य है ! 

2 टिप्‍पणियां:

  1. गुरु की महिमा अपरम्पार है ... गुरु बिन ज्ञान नहीं जीवन में ...
    सुन्दर रचना है गुरु वंदन में ...

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  2. सत्य कहा है आपने..स्वागत व आभार !

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