शुक्रवार, अगस्त 11

तिर जाओ पात से

तिर जाओ पात से

सुनो ! तारे गाते हैं
फूलों के झुरमुट.. प्रीत गीत गुनगुनाते हैं
पल भर को निकट जाओ वृक्षों के
कानों में कैसी, धुन भर जाते हैं !

देखो ! गगन तकता है
बदलियों का झुंड झूम-झूम कर बरसता है
ठिठको जरा सा.. बैठो, हरी घास पर
पा परस दिल.. कैसे धड़कता है !

बहो ! कलकल बहती है
नदिया की धारा नाच बात यही कहती है
पात से तिर जाओ नीर संग
हृदय की तृषा मिटे, छांव वह मिलती है !

जगो !  उषा जगाती है
हर भोर उसी का संदेश लेकर आती है
आतुर है प्रकृति लुटाने को
ज्योति भरे नित नवीन, अंकुर उगाती है !







8 टिप्‍पणियां:

  1. रचना बहुत ही अच्छी है ,सुन्दर !

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  2. वाह बहुत खूब ....
    मंगलकामनाएं आपको !

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  3. सुन्दर ... आशा और जीवन अनुराग का संचार करती है आपकी रचना ...

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    1. स्वागत व आभार दिगम्बर जी !

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  4. आप भी तो एक धुन सी ही भर जाती हैं । मधुर - मधुर बजती हुई ।

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    1. वाह कितनी मधुर प्रतिक्रिया...स्वागत व आभार अमृता जी..सभी कविताओं पर आपकी सरस उपस्थिति के लिए !

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